जयपुर की वाणिज्यिक अदालत में 5 जुलाई 2025 को एक ऐसा फैसला आया, जिसने अडानी समूह से जुड़े कोयला सौदे को हिला दिया। जज दिनेश कुमार गुप्ता ने कहा कि परसा केंते कोलियरीज लिमिटेड ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम (आरआरवीयूएनएल) से 1,400 करोड़ रुपये से ज्यादा की अवैध परिवहन लागत वसूल ली। उसी दिन राजस्थान भाजपा सरकार ने जज को पद से हटा दिया और हाईकोर्ट ने उन्हें ब्यावर ट्रांसफर कर दिया।
विवाद की जड़ 2007 का कोयला ब्लॉक आवंटन है। केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में स्थित ब्लॉक आरआरवीयूएनएल को दिया, ताकि राज्य की थर्मल प्लांट्स को सस्ता कोयला मिले। बाद में सरकारी कंपनी ने अडानी समूह के साथ जॉइंट वेंचर बनाया, जिसमें निजी हिस्सेदारी 74% थी। खनन शुरू हुआ, लेकिन रेल साइडिंग न बनने पर कोयला सड़क से लाया गया। समझौते में सड़क परिवहन का प्रावधान नहीं था, फिर भी अडानी पक्ष ने लागत वसूल ली।
2020 में अडानी कंपनी ने ब्याज मांगते हुए केस दायर किया। जज गुप्ता ने सरकारी पक्ष को सही ठहराया। उन्होंने फैसले में नोट किया कि साइडिंग बनाना अडानी की जिम्मेदारी थी। कंपनी पर 50 लाख का जुर्माना लगाया और राज्य सरकार को सीएजी से पूरे सौदे का ऑडिट कराने को कहा। यह आदेश खनन क्षेत्र के विवादास्पद समझौतों पर सवाल उठाता है।
सरकार की प्रतिक्रिया तेज थी। विधि विभाग ने जज को ‘रिपैट्रिएट’ कर हाईकोर्ट भेज दिया। हाईकोर्ट ने 18 जुलाई को फैसले पर स्टे दे दिया। अब मामला लंबित है, अगली सुनवाई जनवरी 2026 के आखिर में। जज गुप्ता का तबादला जयपुर से 200 किमी दूर ब्यावर में हो गया।








