देश

छठ पर्व – नहाय-खाय के साथ चार दिनी छठ पर्व की शुरूआत आज से

छठी मैय्या और सूरज देवता की आराधना का छठ पर्व पूजन का आरंभ 8 नवंबर दिन सोमवार से हो रहा है। छठ पूजा की शुरूआत कल नहाय-खाय से होगी। डूबते सूर्य को अर्घ्य 10 नवंबर को दिया जाएगा। 11 नवंबर को उगते सूरज को अर्घ्य देकर पूजा का समापन होगा। इस पर्व को लेकर सतना शहर सहित रीवा संभाग के विभिन्न स्थानों पर निवास करने वाले बिहारवासी परिवारों में भारी उत्साह देखा जा रहा है। पिछले कई दिनों सेत्यौहार की तैयारी में जुटे परिवार सोमवार को नहाय-खाय के साथ इस पर्व की शुरूआत करेंगे।

पर्व के पीछे के कारण और महत्व

इस पर्व के पीछे कारण यह है कि इसकी शुरूआत अंगराज कर्ण से माना जाता है। अंगप्रदेश वर्तमान में भागलपुर में है, जो बिहार में स्थित है। अंगराज कर्ण के विषय में कथा है कि, यह पाण्डवों की माता कुंती और सूर्य देवकी संतान है। कर्ण अपना आराध्य देव सूर्य देव को मानते थे। अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंगदेश के निवासी सूर्यदेव की पूजा-उपासना करने लगे। धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र तक हो गया। यह भी मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं। पौराणिक ग्रंथों में भगवान श्रीराम के अयोध्या आने के बाद माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूयोर्पासना की थी। इसके अलावा महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूयोर्पासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ा जाता है। इसी कारण लोग सूर्यदेव की कृपा पाने के लिए भी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करते हैं।

36 घंटों का व्रत और 4 दिन का उत्सव

छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला लोक पर्व है। यह चार दिवसीय उत्सव है, जिसकी शुरूआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होती है और कार्तिक शुक्ल सप्तमी को इस पर्व का समापन होता है।

पहला दिन – नहाय खाए:

इस दिन स्नान के बाद घर की साफ-सफाई की जाती है और मन को तामसिक प्रवृत्ति से बचाने के लिए शाकाहारी भोजन किया जाता है। इस दिन व्रती स्नान कर नए वस्त्र धारण कर पूजा के बाद चना दाल, कद्दू की सब्जी और चावल को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। व्रती के भोजन करने के बाद परिवार के सभी सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं।

दूसरा दिन – खरना:

खरना में पूरे दिन का उपवास होता है। इस दिन व्रतीजल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करता है। संध्या के समय व्रती लकड़ी के चूल्हे पर गुड़ की खीर बनाते हैं और घी लगी हुई रोटी का सेवन करते हैं। इसे ही घर के बाकी सदस्य भी प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। इसके बाद से ही 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। पौराणिक मान्यता है कि खरना पूजा के बाद ही छठी मइया का घर में आगमन हो जाता है।

तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य:

छठ पर्व के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को संध्या के समय सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। शाम को बांस की टोकरी में फलों, ठेकुआ, चावल के लड्डू आदि से अर्घ्य का सूप सजाया जाता है, जिसके बाद व्रती अपने परिवार के साथ सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य के समय सूर्य देव को जल और दूध चढ़ाया जाता है और प्रसाद भरे सूप से छठी मैया की पूजा की जाती है। सूर्य देव की उपासना के बाद रात्रि में छठी माता के गीत गाए जाते हैं और व्रत कथा सुनी जाती है।

चौथा दिन – उषा अर्घ्य:

छठ पर्व के अंतिम दिन सुबह के समय सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले नदी के घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद छठ माता से संतान की रक्षा और पूरे परिवार की सुख शांति का वर मांगा जाता है। पूजा के बाद व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर और थोड़ा प्रसाद खाकर पारण करते हैं। सुबह के अर्घ्य के साथ ही इस व्रत की समाप्ति हो जाती है।

हुड़दंग न्यूज

हुड़दंग न्यूज (दबंग शहर की दबंग खबरें) संवाददाता की आवश्यकता है- संपर्क कीजिये-  hurdangnews@gmail.com

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button