By Vijay
जेम और इंडस्ट्रियल क्वालिटी के तकरीबन 1 अरब से 3.5 अरब वर्ष पुराने प्राकृतिक हीरों की दुनिया में पन्ना के हीरों की धाक है। यह देश का इकलौता सक्रिय हीरा उत्पादक क्षेत्र है। अकेले पन्ना जिले में डायमंड का वार्षिक उत्पादन लगभग 1 लाख कैरेट है। यानि देश के कुल हीरा उत्पादन में पन्ना की भागीदारी 90 फीसदी है। इतना ही नही एशिया की एक मात्र मैकेनाइज्ड डायमंड माइंस भी यहीं मझगवां में संचालित है। इसके बावजूद पन्ना के हीरों को अभी तक वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) में जगह नहीं मिली है। आखिर क्यों ? सहायक जिला उद्योग अधिकारी कुलदीप चौरहा दिलासा देकर कहते हैं- डायमंड को ओडीओपी में लाने का प्रस्ताव जल्द ही राज्य स्तरीय नोडल एजेंसी एमएसएमई को भेजा जाएगा।
सितंबर 2021 में तबके सीएम शिवराज सिंह चौहान ने स्थनीय स्तर पर पन्ना में ही हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग आधारित लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए डायमंड पार्क स्थापित किए जाने की घोषणा की थी। यह घोषणा अब तक कागजों में दुबकी हुई है । उत्पादित हीरों का चमकाने का पूरा काम सूरत और मुंबई की मुट्ठी में है। प्रगति के नाम पर राज्य शासन ने डायमंड पार्क के लिए सिर्फ 13.26 हेक्टेयर शासकीय भूमि आवंटित की है। यही वजह है कि यहां के कच्चे हीरों की दम पर गुजरात का सूरत शहर डायमंड कैपिटल इनकर दमकता है। कीमती खनिजों की किताब के किसी पन्ने पर पन्ना और मझगवां का नाम जरूर लिखा हुआ मिल जाता है।
क्या है ओडीओपी • जिला स्तर के विशिष्ट उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रांडिंग के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 2020 में वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) योजना लांच की थी ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बन सकें। वर्ष 2021 में इस योजना को राज्य सरकार ने अपनाया। पन्ना के आंवला को ओडीओपी का दर्जा मिला। गनीमत थी नवंबर 2025 में पन्ना हीरा को नैचुरल गुड्स की श्रेणी में जीआई टैग जरूर मिला। ओडीओपी की राज्य सूची में जगह नहीं मिली।
पन्ना में ही हीरा क्यों ?
आईबीएम और एसआई के सर्वेक्षण में यहां 12 लाख कैरेट डायमंड के भंडार का अनुमान लगाया गया है। ये हीरा पट्टी पन्ना के केंद्र से छतरपुर और सतना जिले की सीमा में 240 किलोमीटर की लंबाई में विस्तृत है। जानकारों ने बताया कि विंध्य सुपरग्रुप की रॉक टाइप किम्बरलाइट पाइप्स और कांग्लोमरेट की चट्टानी संरचनाओं में प्राकृतिक तौर पर हीरा मौजूद है। इसी भूगर्भीय गुण के कारण देश में मध्यप्रदेश एकमात्र हीरा उत्पादक राज्य है। सरकारी रिकार्ड के मुताबिक वर्ष 1961 से 2020 की स्थिति में समग्र पन्ना प्रोजेक्ट के तहत तकरीबन 13.65 लाख कैरेट वजन के लगभग 2 हजार 2 सौ करोड़ रुपए मूल्य के हीरे प्राप्त किए जा चुके हैं।
ऐसे हुई थी खोज | इन्हीं जानकारों के अनुसार बुंदेला रियासत और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच एक संधि के तहत वर्ष 1827 में ब्रिटिश कैप्टन जेम्स फ्रैंकलिन ने किवदंतियों के आधार पर पन्ना क्षेत्र में हीरों का भू वैज्ञानिक अध्ययन किया था। हीरों का संगठित उत्खनन वर्ष 1961 में शुरू किया गया। पन्ना में हीरा विभाग के विशेष कार्यालय की स्थापना की गई। वर्ष 1971-72 में भारत सरकार के उपक्रम एनएमडीसी (नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कारपोरेशन) ने मैकेनाइज्ड सिस्टम से हीरे का उत्खनन शुरू कराया। इसके अलावा मौजूदा समय में पन्ना जिले में सरकारी और गैर सरकारी भूमियों पर उत्खनन के लिए 347 लीज स्वीकृत हैं। इन प्लाटों को उथली खदान कहा जाता है । मझगवां, हिनौता, कृष्णा कल्याणपुर, जरूआपुर, बड़ बडगड़ी, सरकोड़ा, पटी, हजारामुद्धा, सकरिया, चोपरा और रमखिरिया क्षेत्र के भूगर्भ में हीरों का भंडार छिपा है।