मध्य प्रदेश ‘टाइगर स्टेट’ का तमगा लिए होने के बावजूद बाघों की लगातार हो रही मौतें अब न्यायिक जांच के घेरे में आ गई हैं। 2025 में राज्य में 54 बाघों की असमय मृत्यु पर जबलपुर हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर मंगलवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्य सरकार और नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 11 फरवरी को निर्धारित की गई।
प्रोजेक्ट टाइगर के 50 साल बाद रिकॉर्ड मौतें
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 1973 में शुरू हुए प्रोजेक्ट टाइगर के इतिहास में पहली बार किसी राज्य में एक वर्ष में इतनी बाघ मौतें दर्ज की गईं। पिछले पांच वर्षों में मप्र में कुल 222 बाघ मारे गए। विशेषज्ञों का मानना है कि आवास ह्रास, मानवीय हस्तक्षेप और आपसी संघर्ष मुख्य कारण हैं। राज्य में कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और सतपुड़ा जैसे प्रमुख अभयारण्यों में बाघों की संख्या भले बढ़ी हो, लेकिन सुरक्षा तंत्र पर सवाल उठ रहे हैं।
बांधवगढ़ में चौथी बाघिन हत्या, कान्हा में तेंदुए का शव
सुनवाई से ठीक एक दिन पहले बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के मानपुर बफर जोन में भयानक घटना घटी। पांच वर्षीय बाघिन की आपसी झड़प में मौत हो गई। जनवरी महीने में यह अभयारण्य में चौथी ऐसी वारदात है। वन अधिकारियों ने पोस्टमॉर्टम में पुष्टि की कि गले पर गहरे घाव बाघ के हमले के थे। इसी क्रम में कान्हा के किसली रेंज में नर तेंदुए का क्षत-विक्षत शव मिला। सिर पर बाघ के दांतों के निशान से साफ है कि यह भी बाघों के संघर्ष का शिकार बना।
क्या कहते हैं आंकड़े और विशेषज्ञ?
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, मप्र में बाघों की आबादी 2022 के 785 से बढ़कर अब 900 के पार पहुंच गई है, लेकिन मौतों का ग्राफ चिंताजनक है। वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. हितेश पांडे ने कहा, “घनी आबादी वाले अभयारण्यों में क्षेत्रीय विवाद बढ़ रहे हैं। कॉरिडोर विस्तार और मॉनिटरिंग मजबूत होनी चाहिए।” एनटीसीए ने पहले भी राज्य को चेतावनी दी थी, लेकिन अमल में कमी दिख रही है।
यह याचिका बाघ संरक्षण के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है। कोर्ट के हस्तक्षेप से यदि सुरक्षा उपाय सख्त हुए, तो ‘टाइगर स्टेट’ का गौरव बरकरार रहेगा। अन्यथा, प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता पर दाग लग सकता है।








