Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द

By: शुलेखा साहू

On: Tuesday, June 17, 2025 10:55 AM

Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द
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Singrauli News : इतिहास बन जाएगा यह शहर! MP के सबसे बड़े शहरी विस्थापन की ग्राउंड रिपोर्ट, दर्द भरी कहानी कास का यह ‘उजला’ पहलू अपने पीछे कितने व्यापक पैमाने पर विनाश का अंधेरा लेकर आया था, यह शहर अब किसी अंधेरे में गुमनाम हो जाएगा, इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगा कि एक ऐसा भी कभी शहर हुआ करता था.

Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द
Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द

मध्यप्रदेश के एक और बड़े शहर का अस्तित्व जल्द ही खत्म होने जा रहा है, इस शहर का नामो निशान हमेश के लिए मिट जाएगा. प्रदेश के सिंगरौली के मोरवा शहर का विस्थापन किया जा रहा है. यहां के करीब 50 हजार लोगों को नए स्थानों पर बसाने की कवायद की जा रही है. मोरबा के विस्थापन को एशिया में नगरीय क्षेत्र का सबसे बड़ा विस्थापन बताया जा रहा है. इसमें करीब 35 हजार करोड़ रुपए का मुआवजा देने का अनुमान जताया गया है. आइए जानते हैं यहां के लोगों का दर्द.

Singrauli News:कोयले का भंडार से खाली हो रहा शहर

सिंगरौली के मोरवा में कोयले का अकूत भंडार है. इस शहर की जमीन के नीचे 2,724 मिलियन टन कोयला दबा पड़ा है. केंद्र सरकार इसके खनन की मंजूरी दे चुकी है, जिसके लिए सिंगरौली शहर की 1485 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की जा रही है.

नार्दर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड यहां कोयले के विशाल भंडार का खनन करेगी. इसके लिए एनसीएल को कोल इंडिया बोर्ड की मंजूरी मिल चुकी है. कोयला निकालने के लिए विशेष रूप से सिंगरौली के मोरवा इलाके से लोगों को हटाया जाएगा. क्षेत्र के करीब 22 हजार मकानों, दुकानों व अन्य इमारतों को तोड़ दिया जाएगा.

Singrauli News: NDTV की टीम ने सिंगरौली मोरवा में जाकर वहाँ के स्थानीय लोगों से विस्थापन होने का दर्द जाना.

1926 से पूर्व यहां खैरवार जाति के आदिवासी राजा शासन किया करते थे. बाद में सिंगरौली का आधा हिस्सा, जिसमें उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के खंड शामिल थे, रीवा राज्य के भीतर शामिल कर लिया गया. बीस वर्ष पहले तक समूचा क्षेत्र विंध्याचल और कैमूर के पहाड़ों और जंगलों से घिरा हुआ था, जहाँ अधिकांशतः कत्था, महुआ, बाँस और शीशम के पेड़ उगते थे. एक पुरानी दंतकथा के अनुसार सिंगरौली का नाम ही ‘सृंगावली’ पर्वतमाला से निकला है, जो पूर्व-पश्चिम में फैली है. चारों ओर फैले घने जंगलों के कारण यातायात के साधन इतने सीमित थे कि एक ज़माने में सिंगरौली अपने अतुल प्राकृतिक सौंदर्य के बावजूद ‘काला पानी’ माना जाता था, जहाँ न लोग भीतर आते थे, न बाहर जाने का जोखिम उठाते थे. किंतु कोई भी प्रदेश आज के युग में अपने अलगाव में सुरक्षित नहीं रह सकता. कभी-कभी किसी इलाक़े की संपदा ही उसका अभिशाप बन जाती है.

Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द
Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द

यहां विस्थापन की एक लहर रिहंद बाँध बनने से आई थी, जिसके कारण हज़ारों गाँव उजाड़ दिए गए थे. इन्हीं नई योजनाओं के अंतर्गत सेंट्रल कोल फ़ील्ड और नेशनल सुपर थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन का निर्माण हुआ. चारों तरफ़ पक्की सड़कें और पुल बनाए गए. सिंगरौली, जो अब तक अपने सौंदर्य के कारण ‘बैकुंठ’ और अपने अकेलेपन के कारण ‘काला पानी’ माना जाता था, अब प्रगति के मानचित्र पर राष्ट्रीय गौरव के साथ प्रतिष्ठित हुआ.

कोयले की खदानों और उन पर आधारित ताप विद्युत गृहों की एक पूरी शृंखला ने पूरे प्रदेश को अपने में घेर लिया. जहाँ बाहर का आदमी फटकता न था, वहाँ केंद्रीय और राज्य सरकारों के अफ़सरों, इंजीनियरों और विशेषज्ञों की क़तार लग गई. जिस तरह ज़मीन पर पड़े शिकार को देखकर आकाश में गिद्धों और चीलों का झुंड मंडराने लगता है, वैसे ही सिंगरौली की घाटी और जंगलों पर ठेकेदारों, वन-अधिकारियों और सरकारी कारिंदों का आक्रमण शुरू हुआ.

Singrauli News: स्थानीय लोगों का दर्द

NDTV से बात करते हुए सिंगरौली (मोरवा) के स्थानीय लोग कहते हैं कि मोरवा वासियों ने राष्ट्र हित में इस फैसले का सहयोग किया है. हमें इस विस्थापन को सोचकर डर लगता है कि यहां हमारी पीढियां बीत गईं. यहां हमने बचपन से लेकर जवानी इसी जगह बिता दी और जब बुढ़ापा का समय आ रहा है तो हमारा विस्थापन होने जा रहा है यह सोच कर भी भयावह लगता है. कई सालों से भाईचारा से हम लोग इस शहर में रहे और अब यह विस्थापन हमारे लिए किसी बड़े दर्द से कम नहीं है. यहां हमारे पूर्वजों की यादें हैं इसके साथ-साथ हमारे बचपन की यादें इन सबको छोड़ कर जाना हमारे लिए बहुत ही दुखदायी है. हम यही चाहते हैं कि इसका दर्द पैसे से कम नहीं किया जा सकता. NCL कंपनी इसके लिए सभी को एक अलग शहर बनाकर दे, ताकि हम वहां सभी एक साथ रह सकें.

Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द
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SINGRAULI – नए साल का जश्न मानाने घर से निकले थे 04 दोस्त, सेफ्टी टैंक में मिला एक साथ 04 शव

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Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द

मध्यप्रदेश के एक और बड़े शहर का अस्तित्व जल्द ही खत्म होने जा रहा है, इस शहर का नामो निशान हमेश के लिए मिट जाएगा. प्रदेश के सिंगरौली के मोरवा शहर का विस्थापन किया जा रहा है. यहां के करीब 50 हजार लोगों को नए स्थानों पर बसाने की कवायद की जा रही है. मोरबा के विस्थापन को एशिया में नगरीय क्षेत्र का सबसे बड़ा विस्थापन बताया जा रहा है. इसमें करीब 35 हजार करोड़ रुपए का मुआवजा देने का अनुमान जताया गया है. आइए जानते हैं यहां के लोगों का दर्द.

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सिंगरौली के मोरवा में कोयले का अकूत भंडार है. इस शहर की जमीन के नीचे 2,724 मिलियन टन कोयला दबा पड़ा है. केंद्र सरकार इसके खनन की मंजूरी दे चुकी है, जिसके लिए सिंगरौली शहर की 1485 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की जा रही है.

नार्दर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड यहां कोयले के विशाल भंडार का खनन करेगी. इसके लिए एनसीएल को कोल इंडिया बोर्ड की मंजूरी मिल चुकी है. कोयला निकालने के लिए विशेष रूप से सिंगरौली के मोरवा इलाके से लोगों को हटाया जाएगा. क्षेत्र के करीब 22 हजार मकानों, दुकानों व अन्य इमारतों को तोड़ दिया जाएगा.

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1926 से पूर्व यहां खैरवार जाति के आदिवासी राजा शासन किया करते थे. बाद में सिंगरौली का आधा हिस्सा, जिसमें उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के खंड शामिल थे, रीवा राज्य के भीतर शामिल कर लिया गया. बीस वर्ष पहले तक समूचा क्षेत्र विंध्याचल और कैमूर के पहाड़ों और जंगलों से घिरा हुआ था, जहाँ अधिकांशतः कत्था, महुआ, बाँस और शीशम के पेड़ उगते थे. एक पुरानी दंतकथा के अनुसार सिंगरौली का नाम ही ‘सृंगावली’ पर्वतमाला से निकला है, जो पूर्व-पश्चिम में फैली है. चारों ओर फैले घने जंगलों के कारण यातायात के साधन इतने सीमित थे कि एक ज़माने में सिंगरौली अपने अतुल प्राकृतिक सौंदर्य के बावजूद ‘काला पानी’ माना जाता था, जहाँ न लोग भीतर आते थे, न बाहर जाने का जोखिम उठाते थे. किंतु कोई भी प्रदेश आज के युग में अपने अलगाव में सुरक्षित नहीं रह सकता. कभी-कभी किसी इलाक़े की संपदा ही उसका अभिशाप बन जाती है.

Singrauli News: सबसे बड़े विस्थापन का दर्द
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यहां विस्थापन की एक लहर रिहंद बाँध बनने से आई थी, जिसके कारण हज़ारों गाँव उजाड़ दिए गए थे. इन्हीं नई योजनाओं के अंतर्गत सेंट्रल कोल फ़ील्ड और नेशनल सुपर थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन का निर्माण हुआ. चारों तरफ़ पक्की सड़कें और पुल बनाए गए. सिंगरौली, जो अब तक अपने सौंदर्य के कारण ‘बैकुंठ’ और अपने अकेलेपन के कारण ‘काला पानी’ माना जाता था, अब प्रगति के मानचित्र पर राष्ट्रीय गौरव के साथ प्रतिष्ठित हुआ.

कोयले की खदानों और उन पर आधारित ताप विद्युत गृहों की एक पूरी शृंखला ने पूरे प्रदेश को अपने में घेर लिया. जहाँ बाहर का आदमी फटकता न था, वहाँ केंद्रीय और राज्य सरकारों के अफ़सरों, इंजीनियरों और विशेषज्ञों की क़तार लग गई. जिस तरह ज़मीन पर पड़े शिकार को देखकर आकाश में गिद्धों और चीलों का झुंड मंडराने लगता है, वैसे ही सिंगरौली की घाटी और जंगलों पर ठेकेदारों, वन-अधिकारियों और सरकारी कारिंदों का आक्रमण शुरू हुआ.

Singrauli News: स्थानीय लोगों का दर्द

NDTV से बात करते हुए सिंगरौली (मोरवा) के स्थानीय लोग कहते हैं कि मोरवा वासियों ने राष्ट्र हित में इस फैसले का सहयोग किया है. हमें इस विस्थापन को सोचकर डर लगता है कि यहां हमारी पीढियां बीत गईं. यहां हमने बचपन से लेकर जवानी इसी जगह बिता दी और जब बुढ़ापा का समय आ रहा है तो हमारा विस्थापन होने जा रहा है यह सोच कर भी भयावह लगता है. कई सालों से भाईचारा से हम लोग इस शहर में रहे और अब यह विस्थापन हमारे लिए किसी बड़े दर्द से कम नहीं है. यहां हमारे पूर्वजों की यादें हैं इसके साथ-साथ हमारे बचपन की यादें इन सबको छोड़ कर जाना हमारे लिए बहुत ही दुखदायी है. हम यही चाहते हैं कि इसका दर्द पैसे से कम नहीं किया जा सकता. NCL कंपनी इसके लिए सभी को एक अलग शहर बनाकर दे, ताकि हम वहां सभी एक साथ रह सकें.

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शुलेखा साहू

मैं एक स्वतंत्र लेखक और पत्रकार हूँ, जो समाज, राजनीति, शिक्षा और तकनीक से जुड़े मुद्दों पर गहराई से लिखती हूँ। आसान भाषा में जटिल विषयों को पाठकों तक पहुँचाना Hurdang News के मंच से मेरा प्रयास है कि पाठकों तक निष्पक्ष, स्पष्ट और प्रभावशाली जानकारी पहुँच सके।
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