लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर जातीय समीकरणों की आंच में तप रही है। राजधानी लखनऊ में ब्राह्मण विधायकों की एक अनौपचारिक बैठक ने भारतीय जनता पार्टी के भीतर खलबली मचा दी है। पार्टी नेतृत्व ने इस “जातिगत एकजुटता” की पहल को संगठन के अनुशासन के खिलाफ बताया, जबकि विरोधी दलों ने इसे ब्राह्मण असंतोष के संकेत के रूप में भुनाने की कोशिश शुरू कर दी है।
सूत्रों के मुताबिक, 23 दिसंबर को यह बैठक कुशीनगर से बीजेपी विधायक पी.एन. पाठक के लखनऊ आवास पर हुई, जो उनकी पत्नी के जन्मदिन के अवसर पर रखी गई थी। लेकिन जब इस बैठक में 40 से अधिक ब्राह्मण विधायकों और कुछ अन्य दलों के नेताओं की मौजूदगी सामने आई, तो इसे जातीय मतदाताओं के बीच नाराज़गी के रूप में देखा जाने लगा।
बीजेपी के अंदर इस घटना से असहजता इतनी बढ़ी कि डिप्टी सीएम बृजेश पाठक को दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करनी पड़ी। वहीं, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने ऐसे आयोजनों को पार्टी की मर्यादा के खिलाफ बताते हुए स्पष्ट चेतावनी जारी की। उन्होंने कहा — “भाजपा का संविधान किसी जातिगत बैठक की अनुमति नहीं देता।”
हालांकि पार्टी के भीतर भी कई वरिष्ठ नेता इस पर अलग राय रखते हैं। मंत्री सुनील शर्मा, धर्मवीर प्रजापति और पूर्व सांसद बृजभूषण सिंह ने कहा कि किसी समुदाय के लोगों का आपस में मिलना कोई अपराध नहीं, जब तक उद्देश्य पार्टी-विरोधी न हो।
विपक्ष ने इस विवाद को हथियार बना लिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर तंज कसा, जबकि शिवपाल यादव ने असंतुष्ट ब्राह्मण विधायकों को समाजवादी पार्टी में आने का न्योता दिया। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने इसे “ब्राह्मणों का अपमान” बताते हुए बीजेपी पर भेदभाव का आरोप लगाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता राजनीति में ब्राह्मण वोट बैंक हमेशा निर्णायक रहा है। ऐसे में यह विवाद विरोधी दलों के लिए अवसर बन गया है और बीजेपी के लिए चुनौती। पार्टी नेतृत्व अब नुकसान नियंत्रण में जुटा है, ताकि आगामी चुनावों से पहले कोई नया असंतोष उभर न सके।








