प्रयागराज के पवित्र माघ मेले में संत समाज में आक्रोश की लहर! ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बुधवार को प्रेस वार्ता के बाद बिना स्नान किए ही मेला क्षेत्र छोड़ दिया। वे काशी के लिए रवाना हो गए, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि के प्रमुख स्नानों को नजरअंदाज करते हुए। शंकराचार्य ने कहा कि दिल में व्यथा और क्रोध भरा है, इसलिए संगम का पवित्र जल भी शांति नहीं दे सकता।
यह फैसला 18 जनवरी के मौनी अमावस्या स्नान विवाद के बाद आया, जब उनकी पालकी को प्रशासन ने रोका। शिष्यों पर धक्का-मुक्की और अपमान के आरोप लगे। 11 दिनों तक शिविर के बाहर धरना देने के बावजूद माफी न मिलने पर उन्होंने मेला समाप्ति से 18 दिन पहले प्रस्थान किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने चार प्रमुख बिंदु उठाए—आत्मा को झकझोरने वाली घटना, माफी की कमी, समय की परीक्षा और सनातनी जागरण।
विवाद की पूरी समयरेखा
माघ मेला की शुरुआत से ही तनाव चला। 18 जनवरी को स्नान जाते वक्त पालकी रोकी गई, शिष्यों को घसीटा गया। शंकराचार्य धरने पर उतरे। प्रशासन ने दो नोटिस जारी कर ‘शंकराचार्य प्रमाण’ मांगा। सीएम योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए ‘कालनेमि’ संबोधन दिया, जिसका जवाब में शंकराचार्य ने ऐतिहासिक तुलनाएं कीं। संत समाज दो फाड़ हो गया, लेकिन तीनों शंकराचार्य उनके समर्थक बने रहे। बरेली मजिस्ट्रेट ने समर्थन में इस्तीफा दिया, तो अयोध्या डीसी ने विरोध में। मंगलवार को प्रशासन का पालकी-फूल बरसाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया गया।
कानूनी मोर्चा और राजनीतिक प्रतिक्रिया
अब मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। वकील गौरव द्विवेदी ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग की। शंकराचार्य ने राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया, कहा—मुगलों जैसा अपमान आज हो रहा। युवाओं से अपील की कि सनातनी प्रतीकों की रक्षा करें। उत्तर प्रदेश सरकार ने चुप्पी साधी है, जबकि भाजपा समर्थक इसे प्रशासनिक फैसला बता रहे। विपक्ष ने सनातन सम्मान पर सवाल उठाए।







