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पढ़िए भारतीय मुसलमानों पर विश्लेषण की ये खबर

अमेरिकी होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम (USHMM) नरसंहार के जोखिम वाले देशों की सूची में भारत को दूसरे स्थान पर रखता है। इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में बढ़ती मुस्लिम विरोधी भावना को कारण बताया गया है.

हाल की घटनाओं ने मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा और भय की भावना को गहरा कर दिया है, जिनमें से एक मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा के लिए यति नरसिंहानंद की ओर से मुसलमानों के खिलाफ़ हिंसा का खुला आह्वान है।

हरिद्वार में यति नरसिंहानंद द्वारा आयोजित ‘धर्म संसद’ के संबंध में बहुत आलोचना के बाद पुलिस ने अब यति नरसिंहानंद को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन इस तरह के आयोजन करने वाले सभी सरकारी नेता एक व्यक्ति विशेष के खिलाफ अभद्र भाषा पर चुप थे।

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नरसंहार की चेतावनी
अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संगठन जेनोसाइड वॉच के संस्थापक प्रोफेसर ग्रेगरी स्टैंटन ने भारत में नरसंहार की चेतावनी देते हुए कहा है कि मुस्लिम लक्ष्य हो सकते हैं।

प्रोफेसर ग्रेगरी स्टैंटन ने ये बात 14 जनवरी को कही. उन्होंने 1994 में हुए रवांडा नरसंहार का भी पूर्वानुमान लगाया था.

उन्होंने कहा है, ”2002 में जब गुजरात में हुए दंगों में एक हज़ार से अधिक मुसलमान मारे गए थे तब से भारत में नरसंहार की चेतावनी पर जेनोसाइड वॉच मुखर रहा है. उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे. दरअसल, इस बात के कई सारे सबूत हैं कि उन्होंने उन नरसंहारों को बढ़ावा दिया. ”

स्टैंटन ने कहा कि मोदी का राजनीतिक जीवन मुस्लिम-विरोधी और इस्लामोफोबिक बयानबाज़ी पर आधारित है

रिपोर्ट में स्टैंटन के हवाले से उत्तराखंड में आयोजित नरसिंहानंद धर्म संसद के बारे में कहा गया है, ”हमें लगता है कि हरिद्वार में हुई इस बैठक का मुख्य मकसद लोगों को नरसंहार के लिए उकसाना था.”

फैक्टचेक वेबसाइट बूम के मुताबिक, स्टैंटन ने कहा कि धर्म संसद में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है वह मुसलमानों के अमानवीयकरण के समान है।

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14 जनवरी को, द टेलीग्राफ ने USHMM के ‘अर्ली वार्निंग प्रोजेक्ट’ के हवाले से भारतीय संदर्भ में कहा, “हमारे सांख्यिकीय मॉडल का अनुमान है “शायद 2021-2022 तक भारत में 14.4 प्रतिशत (लगभग 7 में से 1) नरसंहार होगा।”

साथ ही, गुरुग्राम में दक्षिणपंथी समूहों द्वारा शुक्रवार की नमाज को स्थगित करने, कश्मीर में जामिया मस्जिद को 24 सप्ताह के लिए बंद करने और सरकारी स्कूलों में मुस्लिम छात्रों के हिजाब और बुर्का पहनने पर प्रतिबंध जैसी घटनाओं ने माहौल बनाया। मुसलमानों में दहशत फैल गई है।

सरकार की चुप्पी
केंद्र सरकार, अपनी ओर से, धार्मिक हिंसा की घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए है. विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिणपंथी समूह, सरकार की इस चुप्पी को सरकार की ओर से समर्थन के रूप में देखते हैं.

कुछ भारतीय अख़बारों ने बीजेपी सरकार की इस चुप्पी पर सवाल उठाए हैं. उर्दू दैनिक अख़बार इंकलाब में छपे एक संपादकीय में कहा गया कि ‘देश में उकसावे के ख़िलाफ़ आवाज़ देश के बाहर और भीतर से उठाई जा रही है, इसके बावजूद, सत्ताधारी दल के किसी भी प्रभावशाली नेता ने ऐसे हिंसक भाषणों की निंदा नहीं की है. उनका मौन ही एकमात्र प्रतिक्रिया है.”

विपक्ष ने भी सरकार के उदासीन रवैये की आलोचना की है.

उर्दू भाषा के अख़बार कौमी आवाज़ ने जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के प्रमुख फ़ारूख़ अब्दुल्ला के हवाले से लिखा कि नफ़रत भरे भाषणों को लेकर सरकारी हलकों में “आपराधिक चुप्पी” ने गंभीर सवाल उठाए हैं.

धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को बचाने लिए भारतीय मुस्लिम समाज (नागरिक समाज के सदस्यों के एक समूह) के 278 लोगों के हस्ताक्षर वाले एक बयान में कहा, “किसी भी भारतीय को पीएम मोदी की चौंकाने वाली चुप्पी से आश्चर्यचकित होना चाहिए.”

वेबसाइट द वायर की एक रिपोर्ट में इस पत्र के हवाले से कहा गया, “पीएम का मौन अक्षम्य है.”

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने एक लेख में लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी ने “एक चुप्पी साधे रखी है, विश्लेषकों का कहना है कि उनका इस तरह चुप रहना ऐसा करने वालों के लिए एक सकारात्मक मौन सहमति की तरह है.”

अल जज़ीरा की 16 जनवरी की एक रिपोर्ट के हवाले से बीजेपी सरकार के प्रवक्ता सैयद ज़फ़र इस्लाम ने धार्मिक हिंसा के दावों को खारिज करते हुए कहा, “ऐसी कोई चीज़ मौजूद नहीं है जिसे चित्रित किया जा रहा है.”

पाकिस्तान ने जताई चिंता
पाकिस्तान ने मुसलमानों के कथित ‘नरसंहार’ के इस तरह आह्वान करने को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है, साथ ही जेनोसाइड वॉच की इस रिपोर्ट पर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का ध्यान भी आकर्षित किया है.

‘संप्रदयिकता बीजेपी का पुरकाना हथकंडा’
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम विरोधी बयानबाजी में वृद्धि देश के पांच राज्यों में होने वाले चुनावों को देखते हुए किया जा रहा है. ये बीजेपी की “डायवर्ज़न (भटकाव) की रणनीति” है.

आलोचक मानते हैं कि संप्रदायिकता से लोगों को भटकाने की नीति बीजेपी के लिए आज़माया हुआ हथकंडा है. वह मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों से भटकाने के लिए फिर सांप्रदायिकता का सहारा ले रही है.

हुड़दंग न्यूज

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