लोक आस्था और अनुशासन का अद्वितीय पर्व छठ महापर्व शनिवार, 25 अक्टूबर से पूरे उल्लास के साथ शुरू हो गया। चार दिवसीय यह पर्व सूर्य की उपासना और पारिवारिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है। शहरों से लेकर गांवों तक घाट सज चुके हैं, बाजारों में बांस के सूप-दौरे, नारियल, सिंघाड़े और ईख के ढेर सजकर धार्मिक रौनक बिखेर रहे हैं।
आज पहले दिन ‘नहाय-खाय’ की विधि के साथ व्रत की शुरुआत हुई, जिसमें व्रती शुद्धता और नियमों का पालन करते हुए स्नान-पूजन कर अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी का प्रसाद ग्रहण करती हैं। यह चरण शरीर और मन की पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
खरना की तैयारी में जुटे
रविवार को दूसरा दिन ‘खरना’ के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन सूर्यास्त के बाद व्रती खीर-पूरी और केले के प्रसाद से पूजा करती हैं। यह दिन 36 घंटे के कठोर निर्जला उपवास के आरंभ का संकेत होता है। मिट्टी के चूल्हे और आम की लकड़ी से बने पकवान धार्मिक अनुशासन और परंपरा के प्रतीक होते हैं।
व्रती महिलाओं का कहना है कि छठ सिर्फ व्रत नहीं, बल्कि आत्मसंयम, धैर्य और भक्ति का संगम है। श्रद्धालु नदी और तालाबों के किनारे दूध और गंगाजल से अर्घ्य देने की तैयारी में लगे हुए हैं।
डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य
तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा निभाई जाएगी। घाटों पर सजे सूप के साथ महिलाएं जल में खड़ी होकर सूर्यदेव और छठी माई की आराधना करेंगी। अगले दिन सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ यह पर्व सम्पन्न होगा।








