भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने बीमा सेक्टर में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बड़ा प्रस्ताव जारी किया है, जिसके तहत सभी बीमा ( Insurance ) कंपनियों को इंडियन अकाउंटिंग स्टैंडर्ड (Ind AS) अपनाने की तैयारी शुरू करनी होगी। यह नया ढांचा 1 अप्रैल 2026 से लागू करने का प्रस्ताव है, जिसके बाद बीमा ( Insurance ) कंपनियों की बैलेंस शीट, मुनाफे और जोखिम का खुलासा पहले से कहीं ज्यादा साफ और तुलनात्मक रूप में दिखेगा।
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IRDAI के एक्सपोजर ड्राफ्ट के मुताबिक, यह नियम जीवन बीमा, ( Insurance ) जनरल इंश्योरेंस, हेल्थ इंश्योरेंस और री-इंश्योरेंस, सभी तरह की कंपनियों पर लागू होगा। Ind AS के तहत बीमा ( Insurance ) कंपनियों को अपनी वित्तीय रिपोर्टिंग अंतरराष्ट्रीय मानकों (IFRS के अनुरूप) के हिसाब से करनी होगी, जिससे भारतीय कंपनियों की रिपोर्ट दुनिया भर के निवेशकों के लिए आसानी से समझने और तुलना करने लायक बन जाएगी।
नए फ्रेमवर्क में बीमा ( Insurance ) कंपनियों की देनदारियों, यानी दावों से जुड़ी भविष्य की जिम्मेदारियों को अब ‘फुलफिलमेंट कैश फ्लो’ के रूप में ज्यादा यथार्थवादी और मार्केट-आधारित तरीके से मापा जाएगा। इसके साथ ही पॉलिसी से भविष्य में मिलने वाले मुनाफे को अलग से ‘कॉन्ट्रैक्चुअल सर्विस मार्जिन (CSM)’ के रूप में दिखाया जाएगा, जिससे यह साफ नज़र आएगा कि कंपनी कितना लाभ कब और किस अवधि में कमा रही है।
IRDAI 2022 से ही बीमा कंपनियों के साथ मिलकर इस ट्रांजिशन की तैयारी कर रहा है, जिसमें गैप असेसमेंट, ट्रेनिंग प्रोग्राम और Ind AS आधारित प्रो-फॉर्मा स्टेटमेंट जमा कराने जैसे कदम शामिल हैं। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि शुरुआती साल में कंपनियों को समानांतर रिपोर्टिंग करनी पड़ सकती है, यानी एक तरफ Ind AS के तहत वैधानिक स्टेटमेंट और दूसरी तरफ पुराने इंडियन GAAP के आधार पर रेगुलेटरी फाइलिंग, ताकि बदलाव सुचारू रूप से हो सके।
आम पॉलिसीधारकों के लिए इस कदम का मतलब है कि जिस कंपनी में वे पॉलिसी लेते हैं, उसकी वास्तविक वित्तीय सेहत पहले से ज्यादा साफ दिखाई देगी। पारदर्शी अकाउंटिंग से यह समझना आसान होगा कि कंपनी का मुनाफा अंडरराइटिंग से आ रहा है या निवेश से, जोखिम प्रबंधन कैसा है और क्या कंपनी लंबे समय तक दावों का भुगतान करने की स्थिति में है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि पॉलिसीधारकों के हितों की सुरक्षा भी मजबूत होगी।
IRDAI ने इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित की हैं और बीमा कंपनियों, इंडस्ट्री बॉडीज, प्रोफेशनल संस्थाओं, एक्चुअरीज और ऑडिटर्स से 24 मार्च 2026 तक सुझाव भेजने को कहा है। यह साफ संकेत है कि अंतिम नियम बनाने से पहले नियामक उद्योग और विशेषज्ञों की राय को गंभीरता से शामिल करना चाहता है, ताकि 1 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाला यह बड़ा बदलाव बिना किसी झटके के लागू किया जा सके।

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भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने बीमा सेक्टर में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बड़ा प्रस्ताव जारी किया है, जिसके तहत सभी बीमा ( Insurance ) कंपनियों को इंडियन अकाउंटिंग स्टैंडर्ड (Ind AS) अपनाने की तैयारी शुरू करनी होगी। यह नया ढांचा 1 अप्रैल 2026 से लागू करने का प्रस्ताव है, जिसके बाद बीमा ( Insurance ) कंपनियों की बैलेंस शीट, मुनाफे और जोखिम का खुलासा पहले से कहीं ज्यादा साफ और तुलनात्मक रूप में दिखेगा।
IRDAI के एक्सपोजर ड्राफ्ट के मुताबिक, यह नियम जीवन बीमा, ( Insurance ) जनरल इंश्योरेंस, हेल्थ इंश्योरेंस और री-इंश्योरेंस, सभी तरह की कंपनियों पर लागू होगा। Ind AS के तहत बीमा ( Insurance ) कंपनियों को अपनी वित्तीय रिपोर्टिंग अंतरराष्ट्रीय मानकों (IFRS के अनुरूप) के हिसाब से करनी होगी, जिससे भारतीय कंपनियों की रिपोर्ट दुनिया भर के निवेशकों के लिए आसानी से समझने और तुलना करने लायक बन जाएगी।
नए फ्रेमवर्क में बीमा ( Insurance ) कंपनियों की देनदारियों, यानी दावों से जुड़ी भविष्य की जिम्मेदारियों को अब ‘फुलफिलमेंट कैश फ्लो’ के रूप में ज्यादा यथार्थवादी और मार्केट-आधारित तरीके से मापा जाएगा। इसके साथ ही पॉलिसी से भविष्य में मिलने वाले मुनाफे को अलग से ‘कॉन्ट्रैक्चुअल सर्विस मार्जिन (CSM)’ के रूप में दिखाया जाएगा, जिससे यह साफ नज़र आएगा कि कंपनी कितना लाभ कब और किस अवधि में कमा रही है।
IRDAI 2022 से ही बीमा कंपनियों के साथ मिलकर इस ट्रांजिशन की तैयारी कर रहा है, जिसमें गैप असेसमेंट, ट्रेनिंग प्रोग्राम और Ind AS आधारित प्रो-फॉर्मा स्टेटमेंट जमा कराने जैसे कदम शामिल हैं। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि शुरुआती साल में कंपनियों को समानांतर रिपोर्टिंग करनी पड़ सकती है, यानी एक तरफ Ind AS के तहत वैधानिक स्टेटमेंट और दूसरी तरफ पुराने इंडियन GAAP के आधार पर रेगुलेटरी फाइलिंग, ताकि बदलाव सुचारू रूप से हो सके।
आम पॉलिसीधारकों के लिए इस कदम का मतलब है कि जिस कंपनी में वे पॉलिसी लेते हैं, उसकी वास्तविक वित्तीय सेहत पहले से ज्यादा साफ दिखाई देगी। पारदर्शी अकाउंटिंग से यह समझना आसान होगा कि कंपनी का मुनाफा अंडरराइटिंग से आ रहा है या निवेश से, जोखिम प्रबंधन कैसा है और क्या कंपनी लंबे समय तक दावों का भुगतान करने की स्थिति में है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि पॉलिसीधारकों के हितों की सुरक्षा भी मजबूत होगी।
IRDAI ने इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित की हैं और बीमा कंपनियों, इंडस्ट्री बॉडीज, प्रोफेशनल संस्थाओं, एक्चुअरीज और ऑडिटर्स से 24 मार्च 2026 तक सुझाव भेजने को कहा है। यह साफ संकेत है कि अंतिम नियम बनाने से पहले नियामक उद्योग और विशेषज्ञों की राय को गंभीरता से शामिल करना चाहता है, ताकि 1 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाला यह बड़ा बदलाव बिना किसी झटके के लागू किया जा सके।

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