उत्तराखंड का कैंची धाम भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में पॉपुलर है। यहां हर दिन हजारों लोग नीम करौली बाबा का आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते हैं। लेकिन इसी जगह से जुड़ी एक दिलचस्प बात है जो कि आपको नहीं मालूम होगी।
कैंची धाम का मंदिर और आश्रम बिना किसी आर्किटेक्ट या नक्शे के ही बना है। यह कहानी 1962 में शुरू होती है जब बाबा नीम करौली पहली बार कैंची गांव आए थे। उस समय वहां पर सिर्फ घना जंगल और बड़े-बड़े पत्थर हुआ करते थे।
बताया जाता है कि महाराज जी किसी बने बनाए प्लान से काम नहीं करते थे। वह जैसे-जैसे निर्देश देते गए वैसे-वैसे मंदिर और आश्रम का निर्माण भी होता गया। बिना किसी पहले से बने डिजाइन के बाबा की सोच और निर्देशों पर बनते-बनते आज कैंची धाम इतना भव्य और पॉपुलर हो गया है कि इन दिनों हनुमान अंश फिल्म रिलीज होने के बाद नीम करौली बाबा और कैंची धाम की चर्चा भी तेज हो गई है। ऐसे में हम आपको इस पोस्ट के बारे में और भी अधिक बताने जा रहे हैं।
1 - 1962 में कैंची गांव पहुंचे थे महाराज जी
श्री कैंची धाम ट्रस्ट के मुताबिक 25 मई 1962 की बात है जब महाराज जी रानीखेत से नैनीताल वापस लौट रहे थे। उनके साथ तुलाराम शाह और सिद्धि मां भी थीं। रास्ते में उन्होंने कैंची गांव में अपनी गाड़ी रुकवाई। गाड़ी से उतरने के बाद उन्होंने पूर्णानंद तिवारी को बुलाया। आपस में बातचीत के दौरान पूर्णानंद को करीब 20 साल पहले हुई एक मुलाकात याद आ गई और यह मुलाकात 1942 की थी। 1942 में हुई थी पहली मुलाकात
साल 1942 में पूर्णानंद तिवारी नैनीताल कोर्ट से मुकदमे से जुड़े कुछ कागज लेकर अपने गांव वापस जा रहे थे। उस समय आने-जाने का कोई विशेष साधन नहीं था इसलिए वह पैदल ही चल दिए। रास्ते में वह ऐसी जगह पहुंचे जिसे खूंफिया डांड भी कहा जाता था। जहां की जगह को कहा जाता था हकीम वहां भूत-प्रेत का साया होता है। ऐसे में पूर्णानंद तिवारी डर गए। तभी उन्होंने देखा कि रास्ते किनारे बनी पत्थर की मुंडेर पर कंबल लिपटे हुए एक बाबा बैठे हुए हैं। यह देखकर वह काफी डर गए। तभी वहां लेटे संत ने उन्हें उनके नाम से बुलाया। पूछा कि तुम पैदल क्यों जा रहे हो? इसके बाद पूर्णानंद तिवारी ने राहत की सांस ली। उन्होंने संत के पैर छुए। संत ने उन्हें बिना डरे आगे जाने के लिए कहा। बताया कि आगे उन्हें मदद के लिए एक ट्रक मिल जाएगा और जब पूर्णानंद तिवारी ने पूछा कि फिर मुलाकात कब होगी तो उनका जवाब था 20 साल बाद।
2 - 1962 में बाबा से मिले पूर्णानंद
इसके बाद उन्हें आगे जाने के लिए कह दिया गया। 20 साल बाद 1962 में जब महाराज जी वापस लौटे तो वह ऐसे मिले जैसे कैंची गांव के बारे में कुछ जानते ही ना हों। इसी मुलाकात के बाद कैंची धाम की असली कहानी शुरू हो गई है। कहानी के मुताबिक कैंची में शिप्रा नदी के पार एक घना जंगल भी था। पहले यहां महान संत सोमवारी बाबा और प्रेमी बाबा ध्यान दिया करते थे। महाराज जी, सिद्धि मां और बाकी भक्तों के साथ नदी पार करके वहां पहुंचे और एक शिला पर बैठ गए। महाराज जी कहने पर वहां साफ-सफाई की गई। इसके बाद हवन कुंड के ऊपर ही चबूतरा बना और बाद में वहीं पर हनुमान जी की मूर्ति भी लगा दी गई।
3 - एक-एक करके बनते गए मंदिर
बताया गया कि धीरे-धीरे आश्रम का दायरा बढ़ता गया और निर्माण होता गया। पहले श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर बना। इसके बाद शिवलिंग, मां पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय जी की स्थापना की गई। कीर्तन भवन में वैष्णवी देवी और विंध्यवासिनी देवी का भी मंदिर बना है। साउथ की तरफ उबड़-खाबड़ जमीन को समतल करके अद्वैत आश्रम और विष्णु, कृष्ण, बलराम और गोविंद जैसी कुटिया बनाई गई। कैंची धाम की सबसे अनोखी बात यह है कि इसका कोई भी नक्शा डिजाइन पहले से निश्चित नहीं किया गया था। महाराज जी जैसे-जैसे आदेश देते गए, मंदिर धीरे-धीरे बनता गया। दरअसल महाराज जी यानी नीम करौली बाबा ने पहले ही कह दिया था यहां एक यहां एक ऐसा आश्रम बनेगा जिसकी पहचान पूरी दुनिया में होगी। 1973 में महाराज जी के जाने के बाद भक्तों ने उनके समाधि मंदिर का काम शुरू किया। 1975 में सिद्धी मां के मार्गदर्शन में मंदिर का निर्माण आगे बढ़ा।
तीन नंबर 15 जून की तारीख क्यों है खास?
15 जून 1976 की बात है जब कैंची धाम के सबसे बड़े वार्षिक उत्सव वाले दिन महाराज जी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई। 15 जून की यह तारीख खुद बाबा जी ने ही तय की थी। 25 मई 1962 को महाराज जी पहली बार कैंची गांव में पहुंचे थे और 20 साल के गैप के बाद पूर्णन तिवारी से बाबा की पहली बार मुलाकात हुई थी। पूरा धाम बिना किसी सिविल इंजीनियर और आर्किटेक्ट के ही बाबा की प्रेरणा और निर्देशों पर ही बना था। कैंची धाम का सबसे बड़ा स्थापना दिवस उत्सव हर साल 15 जून को ही बनाया जाता है।

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